Shishir Chaudhary

क़िताबें

मेरे कमरे के एक अदृश्य कोने में
पड़ी है ढेरों कहानियाँ
कुछ पढ़ीं सी
कुछ अनछुई |

समय के बाग़ से
थोड़ी पत्तियाँ तोड़
अर्पित करने को कहता है
कभी कोई रुश्दी
कभी दोस्तोयेव्स्की |

अरज सुन उनकी मैंने
उठाई एक दुनिया सकुचाई सी
पन्नों की खुशबुओं के बीच दिखा मुझे
वो दिन २००८ का

जब भरे कोहरे में कोट पहन
दिल्ली की उस दुकान से
निकला था मैं ये क़िताब ख़रीद |

सोचा था पढूंगा एक दिन
जब वक़्त की दरिया बहेगी
जब वक़्त चुराए नहीं जायेंगे |

आज खड़ा हूँ मैं मूक यहाँ
इस सोच में

के जी ही लेता दुनिया अनेक

जब वक़्त की दरिया बहती थी
जब वक़्त चुराए नहीं जाते थे |

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