देखो निकला वो अपने घर से
साफ़ा पहने, काले मन से।
हाथ में ऐपल, सर पे नाइकी
साथ में नौकर झोला पकड़े।
झोले में क्या?
तुझको क्या!
मन में है क्या?
तुझको क्या!
मन में जो भी है दया,
उसका भी तो ताव नया।
चार की गाड़ी, बैठा एक,
बैठा है दूजा मारने ब्रेक।
सेवा है ये सेवा है,
छुपा हुआ सा मेवा है।
सेवा है भाई सेवा है,
यही समाज सेवा है। – २
देखो वो दिखा तुझे? क्या?
अर्रे सामने देख, दिखा तुझे क्या?
हाँ जी हाँ जी फ़्लाइओवर।
ग़रीब जहाँ सोते जहाँ रहते
जहाँ के बच्चे छोटे मोटे।
फूल बेचते भीख माँगते
नंगे ताबड़ तोड़ भागते।
खान मिला है ग़रीबी का
ताव नया है अमीरी का
एक क़लम भारी, एक पारले जी,
एक सेब अब खाले भी।
रुक लेकिन पहले एक पोज़ मार
तस्वीर लेनी है तेरी बार बार
“हाथ में ऐपल, तेरे मेरे”
फ़ेस्बुक पे डालूँगा, लाइक की रिक्वेस्ट मारूँगा
संग सोशल सर्विस, हैपीनेस।
ग्रासरूट का बढ़ता अवशेष
मैंने मिटाया, वीकेंड मनाया।
अब चल भाई ड्राइवर गाड़ी निकाल
और ले चल एक रेस्ट्रॉंट विशाल
जहाँ हो ए सी, मिनरल वाटर।
–
एक आदमी आया था,
साथ में ऐपल लाया था।
जब खाया मैंने आधा वो,
निकला एक कीड़ा, शायद दो।
पारले जी से भूख मिटी तो
अगला सिग्नल लाल हुआ,
वही आदमी निकला
अपनी लम्बी गाड़ी में,
शीशे खोल, हाथ निकाल,
शौक़ से उड़ाता धुआँ।
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